तेरहवीं : शोक से शोरूम तक का सफ़र
कभी तेरहवीं का मतलब होता था—चुप्पी, सादगी और आत्ममंथन। अब इसका मतलब है—पंडाल, पार्किंग, प्रोटोकॉल और प्लेट। लगता है भारतीय समाज ने तय कर लिया है कि मृत्यु भी अब निजी दुख नहीं, सार्वजनिक आयोजन है। शुद्धिकरण पूजा धीरे-धीरे “शुद्ध शाकाहारी मेन्यू” में बदल चुकी है।
पिछले दिनों मुझे ट्राइसिटी में एक तेरहवीं में शामिल होने का अवसर मिला। अवसर इसलिए कह रहा हूं, क्योंकि वहां पहुंचते ही समझ आ गया कि यह कोई साधारण धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि पूरी तरह से “इवेंट मैनेजमेंट” था। दिवंगत सज्जन अपने समय के बड़े सरकारी अधिकारी रहे थे और उनके उत्तराधिकारी भी प्रशासनिक ऊंचाइयों पर विराजमान थे। जाहिर है, तेरहवीं भी उसी स्तर की होनी थी।
₹3100 की टैक्सी किराए के बाद जब मौके पर पहुंचा , तो लगा किसी मंत्री की रैली में आ गया हूं । सड़क पर भव्य पंडाल, ट्रैफिक पुलिस तैनात, अलग से पार्किंग, और फोर्स के जवान मेहमानों को ऐसे भीतर ले जा रहे थे जैसे किसी वीवीआईपी समारोह में आमंत्रित किया गया हो।
गेट पर खड़े दिवंगत के पुत्र ने हमें देखा—या शायद नहीं देखा। उनकी दृष्टि केवल उन चेहरों पर टिक रही थी जिनसे भविष्य में काम पड़ सकता था। सामान्य रिश्तेदार और पुराने परिचित बस “बैकग्राउंड आर्टिस्ट” थे।
पंडाल के भीतर प्रवेश किया तो आंखें श्रद्धा से नहीं, आश्चर्य से फैल गईं। मेजों पर व्यंजनों की ऐसी श्रृंखला थी कि किसी पांच सितारा होटल को भी आत्मग्लानि हो जाए। पनीर की गिनती भूल चुका था, तभी एक स्टॉल पर गरम-गरम इडली-डोसा बनते दिखे। जिज्ञासा हुई तो मृतक के एक जानकार ने ज्ञान दिया—“देर हो जाती है पूजा में, ज्यादा भूख वालों के लिए साउथ इंडियन इंतजाम है।
करीब दो बजे कुछ खास लोग झोला और कपड़े के थैले लिए बाहर आते दिखे। समझ गया—पूजा संपन्न हो चुकी है। चेहरे देखे तो शोक नहीं, संतोष झलक रहा था। उत्सुकतावस मैं पूछ ही बैठा, “इतने खुश क्यों हैं?” जवाब मिला—“भैया, ऐसा भोजन और ग्यारह हजार का लिफाफा, ऊपर से सूट का कपड़ा… ऐसी तेरहवीं रोज हो तो जीवन ही बदल जाए।”
उस पल मैं यह तय नहीं कर पाया कि सिर झुकाऊं या आंखें। यह तेरहवीं थी या रिसेप्शन? मृतक का नाम शायद ही किसी ने लिया। न उनकी जीवन-यात्रा की चर्चा, न कोई भावुक स्मृति। आंसू की जगह ठहाके थे और श्रद्धांजलि की जगह सेल्फी।
वापसी के रास्ते यही सोचता रहा—शुद्धिकरण के नाम पर यह कैसा शोर? कभी तेरहवीं में लोग दिवंगत के गुणों को याद करते थे, उनके साथ बिताए पलों को साझा करते थे। भोजन भी प्रतीकात्मक होता था—कचौड़ी, कद्दू की सब्जी, बूंदी। अब तेरहवीं स्टेटस सिंबल बन गई है “हमारे यहां शोक भी स्तर वाला होता है।”
शायद समाज बहुत आगे निकल गया है, या शायद हम ही पीछे रह गए हैं—अस्सी के दशक की सोच में, जहां मृत्यु अभी भी मौन मांगती थी, मेन्यू नहीं।
रीतेश माहेश्वरी





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