धर्म का स्वरूप: सेवा या स्वार्थ?
भारत को सदियों से धर्म, आस्था और आध्यात्म की भूमि माना जाता रहा है। यहाँ धर्म केवल पूजा-पाठ या कर्मकांड तक सीमित नहीं रहा, बल्कि जीवन के हर पक्ष को दिशा देने वाला तत्व रहा है। आस्था ने व्यक्ति को कठिन परिस्थितियों में संबल दिया, उसे नैतिकता और मानवता से जोड़े रखा। किंतु बदलते समय के साथ यह देखा जा रहा है कि आस्था का स्वरूप धीरे-धीरे विकृत होता जा रहा है। धर्म, जो आत्मिक शांति का माध्यम था, कई स्थानों पर भय, अंधविश्वास और व्यापार का साधन बनता जा रहा है।
आज का यथार्थ यह है कि धार्मिक परंपराओं का एक बड़ा हिस्सा अपने मूल उद्देश्य से भटक चुका है। जिन कर्मकांडों का उद्देश्य मनुष्य को आत्मिक संतुलन देना था, वे अब आर्थिक लेन-देन और दिखावे से जुड़ गए हैं। तीर्थस्थल, जो कभी तप, त्याग और साधना के केंद्र हुआ करते थे, आज कई बार बाजार का रूप धारण कर चुके हैं। श्रद्धालु की भावना से अधिक उसकी आर्थिक स्थिति को महत्व दिया जाने लगा है।
आस्था का मूल आधार विश्वास है—ईश्वर में, जीवन में और स्वयं में। यह विश्वास किसी डर या लालच से नहीं, बल्कि आंतरिक संतोष से उपजता है। जब आस्था भय पर आधारित हो जाती है, तब वह पाखंड में बदल जाती है। दुर्भाग्यवश, आज अनेक धार्मिक गतिविधियाँ इसी भय को केंद्र में रखकर संचालित की जा रही हैं। लोगों को यह विश्वास दिलाया जाता है कि यदि उन्होंने किसी विशेष परंपरा का पालन नहीं किया या तय राशि का दान नहीं दिया, तो अनिष्ट हो जाएगा। इस प्रकार धर्म, जो आश्वासन देने वाला था, भय पैदा करने वाला बनता जा रहा है।
परंपराएँ किसी भी समाज की पहचान होती हैं। वे पीढ़ी-दर-पीढ़ी अनुभव और ज्ञान के माध्यम से विकसित होती हैं। लेकिन परंपराएँ तब तक ही उपयोगी हैं, जब तक वे समय, विवेक और मानवता के अनुरूप हों। परंपराओं को पत्थर की लकीर मान लेना समाज के विकास में बाधा बनता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम परंपराओं की समीक्षा करें—यह समझें कि उनका उद्देश्य क्या है और वे वर्तमान समय में कितनी प्रासंगिक हैं।
धर्म का एक महत्वपूर्ण पक्ष सेवा रहा है। सेवा का अर्थ है—निस्वार्थ भाव से दूसरों की सहायता करना। किंतु जब सेवा के बदले मूल्य तय कर दिया जाए, तब उसका स्वरूप बदल जाता है। दान तभी दान कहलाता है जब वह स्वेच्छा से दिया जाए। जब दान दबाव, भय या सामाजिक प्रतिष्ठा के कारण दिया जाता है, तब वह अपनी पवित्रता खो देता है। दुर्भाग्य से, आज दान भी कई जगह अनिवार्य शुल्क की तरह वसूला जाने लगा है।
इस स्थिति का सबसे अधिक प्रभाव साधारण और भावनात्मक लोगों पर पड़ता है। दुख, शोक या संकट की घड़ी में व्यक्ति मानसिक रूप से कमजोर होता है। ऐसे समय में यदि उसकी आस्था का शोषण किया जाए, तो यह न केवल अनैतिक है, बल्कि अमानवीय भी है। धर्म का उद्देश्य मनुष्य को टूटने से बचाना है, न कि उसे और अधिक बोझिल बनाना।
पाखंड का सबसे बड़ा खतरा यह है कि वह धीरे-धीरे धर्म के प्रति अविश्वास को जन्म देता है। जब लोग बार-बार ठगे जाते हैं, उनकी भावनाओं का दोहन होता है, तो वे या तो धर्म से दूर हो जाते हैं या फिर हर परंपरा को संदेह की दृष्टि से देखने लगते हैं। यह स्थिति समाज के लिए घातक है, क्योंकि धर्म का स्वस्थ स्वरूप सामाजिक संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
आज के शिक्षित और जागरूक समाज में यह अपेक्षा की जाती है कि व्यक्ति हर बात को तर्क और विवेक की कसौटी पर परखे। आस्था और विवेक एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। सच्ची आस्था वही है जो विवेक के साथ चल सके। यदि कोई परंपरा मानवता, नैतिकता और करुणा के विरुद्ध जाती है, तो उसे बदलना ही धर्मसम्मत कदम माना जाना चाहिए।
धार्मिक संस्थानों और धर्म से जुड़े लोगों की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्हें यह समझना होगा कि उनकी जिम्मेदारी केवल कर्मकांड करवाना नहीं, बल्कि समाज को सही दिशा देना भी है। यदि धार्मिक नेतृत्व स्वयं लालच और स्वार्थ से प्रेरित होगा, तो आमजन से नैतिकता की अपेक्षा करना व्यर्थ है। धर्म को व्यवसाय नहीं, बल्कि सेवा का माध्यम बनाना समय की माँग है।
इसके साथ ही समाज की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। जब तक लोग स्वयं जागरूक नहीं होंगे, तब तक पाखंड समाप्त नहीं होगा। प्रश्न करना अधर्म नहीं है। हर परंपरा का उद्देश्य समझना और उस पर विचार करना बौद्धिक परिपक्वता का संकेत है। आँख मूँदकर हर बात मान लेना न तो आस्था है और न ही धर्म।
मीडिया और शिक्षा संस्थानों की भूमिका भी इस संदर्भ में अहम है। यदि धार्मिक मुद्दों पर संतुलित, तार्किक और संवेदनशील चर्चा होगी, तो समाज में जागरूकता बढ़ेगी। शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार नहीं, बल्कि विवेकशील नागरिक तैयार करना भी है—ऐसे नागरिक जो आस्था और अंधविश्वास में अंतर समझ सकें।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम धर्म को उसके मूल स्वरूप में लौटाने का प्रयास करें। ऐसा धर्म, जो भय नहीं, बल्कि शांति दे; जो शोषण नहीं, बल्कि संरक्षण करे; और जो विभाजन नहीं, बल्कि एकता का संदेश दे। आस्था को आत्मा की शक्ति बनाना होगा, न कि किसी के स्वार्थ का साधन।
अंततः यह स्पष्ट है कि धर्म का भविष्य परंपराओं से अधिक हमारी सोच पर निर्भर करता है। यदि हम विवेक, करुणा और आत्मसम्मान को आस्था का आधार बनाएँ, तो पाखंड अपने आप समाप्त होने लगेगा। सच्चा धर्म वही है जो मनुष्य को बेहतर इंसान बनाए। आज के समय में यही सबसे बड़ी आवश्यकता और सबसे बड़ा धर्म है।
– डॉ प्रियंका सौरभ



Leave a Reply
Want to join the discussion?Feel free to contribute!